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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 94, Verses 5–6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 94, verses 5–6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 5, 6

संस्कृत श्लोक

कुम्भ उवाच । वासनैव महाराज स्वरूपं विद्धि चेतसः । चित्तशब्दस्तु पर्यायो वासनाया उदाहृतः ॥ ५ ॥ त्यागस्तस्यातिसुकरः सुसाध्यः स्पन्दनादपि । राज्यादप्यधिकानन्दः कुसुमादपि सुन्दरः ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

कुम्भ ऋषि उसीको कहते हैं। कुम्भ ने कहा : हे महाराज, वासना ही चित्त का स्वरूप है, यह जान लीजिये । चित्तशब्द तो वासना का पर्याय कहा गया ह । उसका त्याग अत्यंत सुकर है यानी केवल उदासीनता का अवलम्बन करनेमात्र से उसकी सिद्धि हो जाती है, अतएव स्पन्दन की अपेक्षा भी वह सुखसाध्य है, राज्य की अपेक्षा उसमें अधिक आनन्द है और कुसुम की अपेक्षा अधिक सुन्दर भी है