Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 95, Verses 20–23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 95, verses 20–23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 95 · श्लोक 20-23
संस्कृत श्लोक
अतः शुद्धो विमुक्तोऽसि कैवोक्तिर्बन्धमोक्षयोः ।
शिखिध्वज उवाच ।
बुद्धोऽस्मि भगवन्युक्तियुक्तमुक्तं त्वयोत्तमम् ॥ २० ॥
कारणाभावतः कर्तृ नेदं ब्रह्मेति वेद्म्यहम् ।
कर्त्रभावाज्जगन्नास्ति तेन नास्ति पदार्थदृक् ॥ २१ ॥
नातश्चित्तादि तद्बीजं नातोऽहंतादि किंचन ।
एवंस्थिते विशुद्धोऽस्मि विबुद्धोस्मि शिवोस्मि वा ॥ २२ ॥
नमो मह्यं परं चेत्यं न किंचिदिति बोधितः ।
पदार्थवेदनादित्थमसदेवावभासते ।
अहमाद्यन्तमेतेन शान्तमासे खकोशवत् ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
उपदिष्ट अर्थ का अपने अनुभव से अनुमोदन कर रहे राजा - युक्क्तिपूर्वक आपने उपदेश दिया -
यों कहते हुए अनुवाद करते हैं।
राजा शिखिध्वज ने कहा : हे भगवन्, असलियत मैं जान गया । आपने बहुत ही उत्तम और
युक्तियुक्त कहा । कारण न होने से यह ब्रह्म जगत् का उत्पादक नहीं हो सकता है, यह भी जानता हूँ।
कर्ता के अभाव से जगत् का अभाव है, जगत् के अभाव से नाम-रूपात्मक दृष्टि का अभाव है, इससे
उसके बीज चित्त आदि का भी अभाव है ओर इसीसे अहन्ता आदि कुछ भी सत्ता नहीं रखते । इस प्रकार
की स्थिति होने पर मैं निर्मल ही हूँ, सर्वज्ञ हूँ और दिव्यस्वरूप हूँ। मैं अपने आपको ही प्रणाम करता हूँ,
क्योकि चितिस्वरूप से भिन्न दूसरा चेत्यविषय है ही नहीं, यह आपने मुझे बतला दिया । आपकी
बतलाई हुई युक्ति से विचारपूर्वक सब पदार्थों का स्वरूप जानने से "अहम्" आदि से लेकर अनन्त तक
के जितने दृश्य पदार्थ हैं वे सब असद्रूप ही भासते हैं, इसलिए सब द्वैत के बाघ से मैं आकाशमण्डल की
नाई विक्षेपशून्य होकर अवस्थित हूँ