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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 95, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 95, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 95 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

तानवं दृश्यते यस्य तस्यानुक्रमतः स्वयम् । पूर्वसंस्थानविगमात्प्रशमोऽप्युपपद्यते ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

लोक में भी अपक्षयपूर्वक ही स्थूल भावों का विनाश प्रसिद्ध है, यह कहते है । व्यवहार में भी जिन देह आदि का अपक्षय हो जाता हे, क्रमश: उनका, पूर्वं अवयवो के विनाश से, स्वयं विनाश भी उपपन्न हो जाता हे