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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 96, Verses 28–30

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 96, verses 28–30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 96 · श्लोक 28-30

संस्कृत श्लोक

आख्यानाख्यास्वरूपस्य निराभासप्रभादृशः । सतो वाप्यसतो वाथ कथं कारणता भवेत् ॥ २८ ॥ यद्वै न कस्यचिद्बीजमनाख्यत्वान्न कारणम् । न किंचिज्जायते तस्मात्प्रमाणादि ततात्मनः ॥ २९ ॥ अकर्तृकर्मकरणं सत्यं चिद्धनमक्षतम् । आत्मरूपमनाभासं स्वयंवेदनमक्षतम् ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

व्यवहार की दृष्टि में शब्द और शब्दार्थभूत समस्त पदार्थों का ही वह स्वरूपभूत है, अतः अपने आप ही अपना कारण कैसे होगा ? परमार्थदृष्टि में अगम्य अति उत्कृष्ट अद्वितीय प्रकाश का स्वरूपभूत है, अतः अद्वितीय वस्तु कारण किस द्वितीय के लिए होगी ? एवं व्यवहार में अद्वैत असत्‌ है और द्वैत सत्‌ है, परमार्थ में तो अद्वैत सत्‌ और द्वैत असत्‌ है, ऐसी परिस्थिति मे सत्‌ ओर असत्‌ का परस्पर कार्यकारणभाव हो ही कैसे सकता है ? वास्तव में जो किसीका बीज नहीं है और जो शब्द से अगम्य होने के कारण कारण नहीं होता, उस व्यापक वस्तु से प्रमाण-प्रमेयरूप जगत्‌ कुछ भी उत्पन्न नहीं होता । वह न कर्ता है, न कर्म है और न कारण ही है । केवल वह सत्य, चिद्घन (&) यहाँ पहला संसर्गाध्यास में दृष्टान्त है और दूसरा तादात्म्याध्यास मेँ दृष्टान्त है, निरपेक्ष होने के कारण वायु और आकाशत्व अधिष्ठान के दृष्टान्त हैं तथा देशसापेक्ष होने के कारण स्पन्द और शून्यता अध्यस्त के दृष्टान्त हैं, यह जानना चाहिए । और विकृतिशून्य है । आत्मरूप, अन्यप्रमाणों से अगम्य तथा अविनाशी स्वात्मानुभवरूप भी वही हे