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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 96, Verses 39–44

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 96, verses 39–44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 96 · श्लोक 39-44

संस्कृत श्लोक

तत्तथैवाशु भवति तादृग्रूपतया शिवः । यथा ज्वाला भ्रमाज्जाता विचित्राकारविभ्रमैः ॥ ३९ ॥ तिष्ठत्यनन्यरूपैव ब्रह्मसत्ता तथैव हि । यत्परं चित्स्वरूपेण स्थितमात्मनि मन्थरम् ॥ ४० ॥ तत्तेन देहदेह्यादिर्जगदादीव लक्ष्यते । केवलं परमेवेत्थं परमं भासते शिवम् ॥ ४१ ॥ अतो जगदहंतादि प्रश्न एवेति नोचितः । यद्वस्तु विद्यमानं सत्प्रश्नस्तत्र विराजते ॥ ४२ ॥ प्रेक्षितं यत्तु नास्त्येव प्रेक्षाप्रश्नेन तत्र किम् । संनिवेशं विना सत्ता यथा हेम्नो न विद्यते ॥ ४३ ॥ तथा जगदहंभावं विना नेशस्य संस्थितिः । अकारणत्वान्नास्तीदं ब्रह्मैवेत्थं विजृम्भते ॥ ४४ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे नेत्रों के दोष-विश्रमों से ज्वाला केशोण्ड्रक आदि रूपों में चित्र-विचित्ररूप से आविर्भूत हुई भी वास्तव में वह अपने ही स्वरूप से रहती है, वैसे ही दोष-विशेष से अन्यान्य रूपों में आविर्भूत भी ब्रह्मसत्ता अपने ही असलीरूप से अवस्थित रहती हे । साधो, जो सर्वोत्कृष्ट परब्रह्म चैतन्यस्वरूप से अवस्थित है, वही अपने विषय में मन्दबुद्धि बनकर उस मन्दबोध के कारण देह, देही आदि जगत्‌ के रूप में मानों लक्षित होता है। चूँकि अबोधवश ही इस जगद्रूप से विशुद्ध परम आनन्दरूप परमात्मा भासता है, इससे निष्कर्ष यही निकलता है कि अहन्ता आदि जगत्‌ को लेकर प्रश्न करना प्रकृत में अनुचित है। जो वस्तु सत्‌ होकर विद्यमान है, उसीके विषय में प्रश्न करना शोभता है, परन्तु भलीभाँति विचारा गया भी जो विद्यमान है नहीं, उसके विषय में विचारार्थ प्रश्न ही क्या ? जिस प्रकार अवयवों की असत्ता-दशा में सुवर्ण की स्थिति के विषय में प्रश्न करना अयोग्य है, वैसे ही अहम्भाव आदि जगत्‌ की असत्ता-दशा में ईश्वर की स्थिति के विषय में प्रश्न करना भी अयोग्य है। विमर्श करने पर जगत्‌ का कोई भी कारण नहीं है, अतः यह तीनों काल में है ही नहीं । केवल अज्ञान के कारण इस तरह जगत्‌ के रूप में ब्रह्म ही स्फुरित होता है । ब्रह्म का स्वरूपतः जब परिज्ञान नहीं रहता, तब अपरिज्ञात ब्रह्म ही जड जगत्‌ का यह बृहदाकार धारण कर अवस्थित हो जाता है