Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 96, Verse 46
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 96, verse 46 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 96 · श्लोक 46
संस्कृत श्लोक
चमत्कुर्वन्त्यमी भावाः पञ्चके मिथुनौघवत् ।
चिन्मात्र एव चिन्मात्रं चिन्मात्रेणावधीयते ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
आवृत चैतन्यभाव ही मायिक नानारूप से अनेक-सा
बनकर तत्-तत् कार्यरूप से उस प्रकार परिच्छिन्न हो जाता है, जिस प्रकार वही आवृत चैतन्यमात्र
स्वात्मज्ञानरूपत्व से व्याप्त होकर परमार्थरूप से चमत्कार करता हे