Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 97, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 97, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 97 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
तत्तद्भुवनमत्यच्छं तत्तन्मात्रं जगद्वपुः ।
न विज्ञानमयोऽर्थोऽस्ति न बाह्यो नापि शून्यता ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
इस विषय में विज्ञानवादी बौद्धों का यह मत है ~ भवन आदि जितने पदार्थ हैं, वे सब भीतरी ज्ञान
के परिणामरूप हैं, अज्ञानवश उनका बाह्नार्थवत् ज्ञान होता है, वास्तव में बाह्यार्थरूप हैं नहीं। गौतम,
कणाद आदि पृथ्वी आदि पाँच भूतरूप बाह्य अर्थो को परमार्थ में भी सत्यरूप मानते हैं, माध्यमिक का
कहना है कि शून्य ही बाह्य-आशभ्यन्तर ग्राह्मग्राहकरूप से अज्ञानवश स्फुरित होता है, वास्तव में कुछ
भी है नहीं - इन मतो का खण्डन कर रहे कुम्भ कहते हैं।
भद्र, न तो विज्ञानरूप अर्थ है, न बाह्य अर्थ है और शून्यरूप ही अर्थ हे, क्योकि सभी वादियों की
कल्पनाएँ ज्ञान के रहते ही हो सकती हैं, ज्ञान के अभाव में नहीं, इसलिए ज्ञान की शून्यता, क्षणिकता,
जन्यता, विनाशिता या परिणति कोई भी किसी तरह से नहीं कह सकता, अतः वही सारभूत वस्तु है।
चैतन्यसार का जिस तरह से उपपादन किया जा सकता है, उस तरह से मैं उपपादन करता हूँ, आप
उसमें दृष्टान्त का श्रवण कीजिए