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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 98, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 98, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 98 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

शिखिध्वज उवाच । चित्तं नास्तीति मे बोधो यथा युक्त्या स्फुटं भवेत् । तामन्यामथवा ब्रूहि बुद्धं न निपुणं मया ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

सत्तानबेवाँ सर्गे समाप्त अद्भानवेवां सर्ग चित्त है ही नहीं, इस ज्ञान को दृढ़ बनाने के निमित्त विषय की असत्ता से चित्त का अभाव और अन्त में अकेले सत्‌ ब्रह्म की सत्ता का सविस्तर वर्णन | प्रकाश के रहते ही रूप आदि का जैसे प्रकाश देखा जाता है, वैसे ही चित्त के रहते ही चिति का या दूसरे पदार्थ का प्रकाश देखा जाता है, अन्यथा नहीं: इस परिस्थिति में यदि ब्रह्माकारवृत्तियुक्त चित्त बाधित हो जायेगा, तो दीपनाश होने पर जैसे अन्धकार हो जाता है, वैसे ही अन्धकार हो जायेगा । दूसरी बात यह है - जो सचित्त है, वे ही सचेतन हैं और जो अचित्त हैं, वे चेतनशून्य हैं, यह लोक में प्रसिद्ध है, अतः जीवन्मुक्त यदि नष्ट चित्त होगे, तो मृत्तिका के सदुश अचेतन ही हो जायेंगे, परन्तु वैसा देखा तो जाता नही । अपितु चित्त के रहते ही निरतिशयानन्दरूपी परमपुरुषार्थ-शास्त्रफल-का अनुभव किया जा सकता है, वित्त के अभाव में नही, अननुभूत कोई भी पुरुषार्थ नहीं होता । किंतु, एक प्रश्न भी होता है, वह यह कि क्या ब्रह्माकार चित्त ही चित्त का बाध करेगा या दूसरा ? पहला तो कर नहीं सकता, क्योकि स्वात्मा में क्रियाविरोध है; यह कहीं नहीं दष्ट है कि काठ आदि दाह्य वस्तु का दहन कर रही अग्नि अपने-आपका भी दहन करे । दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है, क्योकि उसके द्वारा बाधित होनेवाला जगत्‌ उसका बाधक हो नहीं सकता । चित्तवृत्ति से अतिरिक्त लोक में बाधक अप्रसिद्ध होने से चुन्दोपदुन्दन्याय का अवसर भी नहीं लाया जा सकता । ब्रह्म तो अनादि है, अतः वह सवका साधक होने के कारण बाधक नहीं हो सकता, इसलिए चित्तवाध निरर्थक, दुष्कर और सर्वानुभव से विरुद्ध है, इत्यादि आशंकाओं के निरसन द्वारा बोध की दृढता चाहनेवाले राजा शिखिध्वज पूछते है । राजा शिखिध्वज ने कहा : मुनिवर, चित्त का अस्तित्व ही नहीं है, इस प्रकार का बोध मुझे युक्ति से जिस तरह विस्पष्ट हो, उसे कहिए। चाहे वह युक्ति पूर्वोक्त ही हो चाहे दूसरी हो, क्योकि अभी तक चित्त नहीं है, यह हमने दृढतापूर्वक नहीं जाना है