Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 98, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 98, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 98 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
अनेनैव प्रयोगेण राजंश्चित्तं न विद्यते ।
जगदेव न सत्साधो कुतश्चित्तादि तद्गतम् ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार जगदुत्पत्ति की असिद्धि होने पर प्रतिज्ञात अर्थ की सिद्धि अनायास सिद्ध है, यह कहते हैं ।
हे राजन्, इसी प्रयोग से चित्त का अस्तित्व नहीं रहता, हे साधो, जब जगत् का ही अस्तित्व है
नहीं, तब जगत् के अन्तर्गत चित्त का अस्तित्व तो कैसे रह सकता है ?