Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 98, Verses 26–30

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 98, verses 26–30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 98 · श्लोक 26-30

संस्कृत श्लोक

तस्मादिदं निरंशस्य चिद्व्योम्नोऽप्रतिघाकृतेः । निराकृतेरनन्तस्य पूर्वात्पूर्वनिरंशतः ॥ २६ ॥ ब्रह्मणः सर्वरूपस्य शान्तस्यात्तस्य यत्समम् । स्वत एवात्मकचनं सर्गप्रलयरूपधृक् ॥ २७ ॥ स्वकं वपुश्च तेनैव ज्ञातं जगदिव क्षणात् । क्षणान्तरानुबुद्धं सद्ब्रह्मैवास्ते निरात्मनि ॥ २८ ॥ ब्रह्मैवेदमतः सर्वं क्वचिन्न जगदादिधीः । क्वाचित्तादि क्वचित्तादि क्व द्वैतैक्यादिकल्पना ॥ २९ ॥ सर्वं निरालम्बमजं प्रशान्तमनादिरित्यात्म यथास्थितं सत् । इदं तु नानेव न चाप्यनाना यथास्थितं तिष्ठ सुकाष्ठमौनम् ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

अब समस्त सृष्टिप्रतिपादक श्रुतियों का और “नेति नेति" इत्यादि सृष्टिनिराकरण करनेवाली श्रुतियों का तात्पर्य, मिलाकर, कहते है । इससे अंशशून्य, प्रतिघातरहित, चिदाकाश, निराकार, अनन्त, पूर्वं से पूर्व होते हुए भी निरंश, पूर्णस्वभाव, सदाप्राप्त ब्रह्मका-जो यह समस्वरूप स्वतः अपना कचन है, वह अपना स्वरूप ही सर्ग-प्रलयरूपधारी जगत्‌ के रूप में जब तक अज्ञान रहता है तब तक जाना जाता है, यह सृष्टि- श्रुतियों का तात्पर्य है ओर वही एकक्षण के बाद "तत्वमसि" आदि शास्त्रों के अनुसार ज्ञात हुआ सत्‌ ब्रह्मरूप होकर द्वैत-निर्मुक्त स्वभाव में स्थित हो जाता है, यह सृष्टिनिराकरण करनेवाली श्रुतियों का तात्पर्य है । शास्त्रीय बोध से सब कुछ ब्रह्म ही ब्रह्म है, न तो कहीं जगत्‌ आदि का ज्ञान है, न कहीं चित्त का अभाव है, न कहीं चित्त आदि हैं और न कहीं द्रेत-एेक्य आदि की कल्पना ही हे । उस प्रकार जाना गया समस्त जगत्‌ उपद्रवनिर्मुक्त होकर निराधार, अजन्मा, अनादि, स्वात्मरूप यथास्थित सदुव्रह्मरूप ही हो जाता है । यह जो अज्ञानियों द्वारा देखे गये रूप से युक्त जगत्‌ हे, वह न नाना है और न अनाना ही है, अतः यथास्थित का व्यवहार कर रहे आप उत्तम काठ के सदृश वाग्‌ आदि व्यापारो से निर्मुक्त होकर स्थित रहिए