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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 99, Verses 21–22

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 99, verses 21–22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 99 · श्लोक 21,22

संस्कृत श्लोक

छायापुरुषवत्स्पन्दि शान्तं निर्मननं जगत् । जगच्छब्दार्थरहितं यः पश्यति स पश्यति ॥ २१ ॥ रूपालोकमनस्कारा नीरसागमभावना । सम्यग्ज्ञानावबोधस्य निर्वाणं वै विदुर्बुधाः ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

तब अचल ब्रह्म में जगत्‌-स्पन्दन का प्रत्यय कैसे होता है, इस पर कहते हैं। जैसे वज़शिला के उदर में प्रतिबिम्बात्मक पुरुष स्पन्दनशील न होता हुआ भी स्पन्दित होता है वैसे ही स्पन्दनशील, मनन-रहित शान्त और जगत्‌-शब्दार्थ से रहित इस जगत्‌ को जो देखता है वही देखता हे । सम्यग्‌ ज्ञान का उदय होने पर ब्रह्म रूपदर्शन तथा आन्तरिक मानसिक कल्पनारएँ निःसार हैं, ऐसी आगमप्रमाण से उत्पन्न जो स्थिर भावना उत्पन्न होती है उसीको विद्वान्‌ लोग निर्वाण की हेतु होने से निर्वाण (मोक्ष) कहते हैं