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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 99, Verses 26–27

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 99, verses 26–27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 99 · श्लोक 26,27

संस्कृत श्लोक

सर्ग एव परं ब्रह्म परं ब्रह्मैव सर्गदृक् । सर्गशब्दार्थरहितो वाक्यार्थस्त्वेष शाश्वतः ॥ २६ ॥ ब्रह्मशब्दार्थसंपत्तौ सर्गशब्दार्थधीः कृता । सर्गशब्दार्थसंसिद्धौ ब्रह्मशब्दार्थधीः कृता ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

“सर्ग शब्द के अर्थभूत भेद का वाध हो जानेपर सृष्टि ओर पर्रह्म में ऐक्य ही भासित होता है, इसको व्यतिरेक से दृढ़ करते हैं। यह सृष्टि ही सृष्टिशब्द के अर्थ से (भेद से) रहित परब्रह्म है और परब्रह्म ही सृष्टि है, क्योकि यह शाश्वत “सर्वं खल्विदं ब्रह्म" इसी श्रुति का वाक्यार्थ हे । सवका उपबूंहण (विकास) करता है, इसलिए “ब्रह्म” है, इस प्रकार ब्रह्मशब्द की अर्थसम्पत्ति होने पर ही लोक में सर्गशब्दार्थ की बुद्धि की गई है और सर्गशब्दार्थ की संसिद्धि होने पर यानी सर्ग-नाम और रूप का विसर्ग (त्याग)-इस तरह सर्ग-शब्दार्थ की सम्पत्ति होने पर त्रिविध परिच्छेद की निवृत्ति हो जाने से "वृह" धातु के अनुसार ब्रह्मशब्द का अर्थ निकलता है, इसलिए सर्गशब्द और ब्रह्मशब्द दोनों एकार्थक ही हैं