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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 99, Verses 5–10

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 99, verses 5–10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 99 · श्लोक 5-10

संस्कृत श्लोक

कुम्भ उवाच । जगदेव न यत्रास्ते तत्राहंत्वंविभासनम् । इत्थमम्बरसंसारः क्व कुतः कीदृशः कथम् ॥ ५ ॥ यथास्थितव्यवहृतिर्मौनी शान्तमना मुनिः । सौम्यार्णवोदरावर्तपरिस्पन्दवदास्व भो ॥ ६ ॥ ब्रह्मरूपमिदं शान्तमित्थमस्ति यथास्थितम् । अहं जगदिदं चेति शब्दार्थात्म नभोमयम् ॥ ७ ॥ इदमाद्यन्तरहितं सर्वं संसारनामकम् । चिच्चमत्कृतिनामात्म नभः कचकचायते ॥ ८ ॥ संनिवेशदृशः शान्तौ तदस्ति कनकं यथा । जगदाद्यर्थसंशान्तौ ब्रह्मेदं विद्यते तथा ॥ ९ ॥ यथा स्वयंभूः संकल्पः स्वयं नाम तथैव हि । एतौ स्ववेदनायत्तौ बन्धमोक्षौ व्यवस्थितौ ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

राजा शिखिध्वज द्वारा कही गई बातों का अनुमोदन कर रहे कुम्भ ऋषि कहते है। कुम्भ ने कहा : हे राजन्‌, आपका कथन सत्य हे । जिस चिदाकाश में यह जगत्‌ ही नहीं हे वहाँ इस तरह का “अहं त्वम्‌“ आदि भानात्मक गन्धर्व-नगर-व्यवहार कैसा ? कहाँ, किस निमित्त से ओर किस प्रकार हो सकता है ? हे राजन्‌, आप यथाप्राप्त व्यवहार करते हुए शान्तमना, मौनी मुनि बनकर प्रशान्त सागर के उदर में शान्त हुए आवर्तपरिस्पन्दन के सदृश अवस्थित रहिये । यह सब यथास्थित शान्त ब्रह्मस्वरूप ही इस तरह अवस्थित हे । मैं और यह सब जगत्‌-शब्दार्थस्वरूप आकाशमय ही हे यानी शून्य ही है । यह सब संसार आदि ओर अन्त से शून्य चित्‌चमत्कृतिनामक जो आत्मस्वरूप आकाश है वही अपने चाकचक्य से दीपित हो रहा है । जैसे कुण्डल आदि सचनाविशेषदृष्टि के शान्त हो जाने पर सुवर्णमात्र अवशिष्ट रह जाता है वैसे ही जगदादि अर्थो के शान्त हो जाने पर एकमात्र ब्रह्म ही अवशिष्ट रह जाता हे । जैसे समष्टि-अहंकारात्मक स्वयंभू संकल्पमात्र ह वैसे ही स्वयं व्यष्टि -अहंकार भी संकल्पमात्र हे । समष्टि और व्यष्टि का बन्ध और मोक्ष-ये दोनों क्रमशः अभिमान ओर अभिमान- परित्याग से जनित आत्म-वेदन के अधीन होकर व्यवस्थित हँ