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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 1, Verse 17

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 1, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 1 · श्लोक 17

संस्कृत श्लोक

स्पन्दस्वाकृतसंकल्पं सुखदुःखान्यभावयन् । प्रवाहपतिते कार्ये चेष्टितोन्मुक्तशष्पवत् ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे स्वतः संकल्प से निर्मुक्त एक छोटा-सा तृण वायु आदि के प्रवाह में पड़कर दूसरे तृण आदि के साथ संयोग और वियोगरूप कार्य में स्पन्दनशील बनता है वैसे ही हे श्रीरामजी, आप भी सुख और दुःख की कुछ भी भावना न करते हुए संकल्पनिर्मुक्त होकर प्रवाहपतित अपने कार्य में चेष्टाशील बने रहिये