Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 10, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 10, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 10 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
नाहन्त्वं लभ्यते साधो बुद्ध्यालोके निरीक्षितम् ।
असदेव कुतोऽप्येतद्बालयक्ष इवोदितम् ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
जिम्न तरह ब्रह्म में सृष्टि आदि की सिद्धि न होने से वह अद्रय प्रिद्ध होता है उछी तरह
प्रत्यगात्मा जीव मे भी अहन्ता आदि की भिद्धि न होने से वह अद्रय भिद्ध होता हैं, यों दोनों तरह
से विचार होने पर अखण्डता ही सिद्ध होती है, इस आशय से कहते हैं /
हे साधो, बुद्धि से विचारकर देखने पर तो अहन्ता कहीं उपलब्ध नहीं होती है। बच्चे के सामने
वेताल के सदृश असद्रूप ही यह कहीं से आ टपकी है