Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, Verses 1–2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 100, verses 1–2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 100 · श्लोक 1,2
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
युक्तिः स्यात्कीदृशी ब्रह्मन्संसारे दुःखशान्तये ।
तेषां येषामयं पक्षः श्रूयतामुच्यतां ततः ॥ १ ॥
यावज्जीवं सुखं जीवेन्नास्ति मृत्युरगोचरः ।
भस्मीभूतस्य शान्तस्य पुनरागमनं कुतः ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
दुःख निवृत्तितप मोष ठहरा वह उनको वांछनीय ही है इस आशय से कहते है)
सकल दुःखो की निवृत्ति को प्राप्त भस्मीभूत देह का पुनः आगमन कैसे हो सकता है ? ऐसा
जिनका सिद्धान्त हो, इस संसार में उनकी दुःखशान्ति के लिए कैसी युक्ति है ?