Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, Verse 37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 100, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 100 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
संविदा संविदोऽसत्तामिहाव्याप्य विनष्टया ।
निर्णीयाङ्गीकृतं यैर्वा जाड्यं तद्वालकैरलम् ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
तत््वज्ञानियों का भूमि आदि थ्रूर्तों की क्षणिकता और स्थिरता में को आग्रह नहीं हैं / अध्यस्त
पदार्थ केवल अधिष्ठान ब्रह्म से ही सारवान् हैं / इसलिए शुक्ति और रजत के मूल्य के विचार की
भाँति उसकी स्थिरता और अस्थिरता का विचार व्यर्थ है, इस अभिप्राय से कहते हैं /
पृथिवी आदि महाभूत स्थिर हों चाहे अस्थिर हों ये केवल चिद्भानरूप ही हैं जब तक अज्ञान
का साम्राज्य है, तभी तक इनकी प्रतीति होती है ॥३ ६॥
संवित् क्षणिक नहीं है. क्योंकि वह अपने अनरितित्वरूप नाश और जड़ता को व्याप्त नहीं कर
सकती, संवित् की व्याप्ति के बिना उन दोनों की सिद्धि नहीं हो सकती, अतः संवित् के क्षणिकत्व
का कथन संभव नहीं है, यह कहते हैं ।
जिन्होंने कालत: असत्ता क्षणिकता ओर देशतः असत्ता जडता दोनों का स्पर्श किये बिना ही
नष्ट हुई क्षणिकत्वाभिमतसंवित् से संवित् की जडता और क्षणिकता का निर्णयपूर्वक स्वीकार
किया है, इस प्रकार के मूर्खो से संभाषण तक नहीं करना चाहिये।