Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, Verse 46
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 100, verse 46 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 100 · श्लोक 46
संस्कृत श्लोक
चिन्मात्राकाशमेवेमाः प्रजा द्वैतैक्यवर्जिताः ।
के वात्र रञ्जनान्या खे यद्वाभाति खमेव तत् ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
द्वैत और एेक्य से विहीन ये सकल प्रजाजन चिदाकाशरूप ही हैं । चिदाकाश में दूसरी रंजना
(राग-द्वैतलेश) क्या हो सकता है। जो यहाँपर द्वैत-सा मालूम पड़ता है वह सब चिदाकाश
ही है