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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 101, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 101, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 101 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । चिन्मात्रमेव पुरुषस्तदेवेत्थमवस्थितम् । चिन्मात्रव्यतिरेकेण किमन्यदुपपद्यते ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

केवल चिन्मात्र ही तत्व है, ऐसा ज्ञान हो जाने पर सभी वादियों की अभय पद में जिस तरह प्रतिष्ठा प्राप्त हो जाय, वैसा वर्णन करने के लिए भ्रूमिका रवते हैं / श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, चिन्मात्र ही पुरुष है । वही नाना वादियों द्वारा परिकल्पित स्थायी तथा क्षणिक आदिरूप से एवं जन्म, मरण, भय, शोक आदि के रूपसे अवस्थित है

सर्ग सन्दर्भ

सौवाँ सर्ग समाप्त एक सौ एकवाँ सर्ग सर्वत्र सदा निर्मल संवित्रूपी एक आत्मा का साक्षात्कार कर रहे पुरुष की, भय के हेतुओं की प्राप्ति न होने से, निर्भयस्थिति का वर्णन।