Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 101, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 101, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 101 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
संविदाकाशमात्रात्मा पिब भुंक्ष्वास्व निर्ममः ।
आकाशकोशकान्तस्य कुत इच्छोदयस्तव ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
ज्ञानपरिपूर्ण महात्माओं का इच्छाशून्य व्यवहार होने से उन्हें कदापि दुःख ग्राप्त नहीं होता,
यह कहते हैं।
आप एकमात्र संविदाकाशरूप ही हैं, इसलिए ममता छोड़कर आप खूब खाइये, पीजिये। आप
सांसारिक सब व्यवहार करते चलिये आप तो आकाशकोश के सदृश निर्मल हैं भला आपमें
इच्छा का उदय कहाँ से हो सकता है ?