Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 101, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 101, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 101 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
इष्टानिष्टदृशो रागद्वेषदोषाः किमात्मकाः ।
संविद्व्योममये स्वप्ने जगदाख्येऽङ्ग कथ्यताम् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
कूटस्थ संवित् का ही विवर्तय स्वप्न जगत् है, इस हमारे प्रिद्धान्त में तो राग-द्वेष की किसी
तरह प्राप्ति ही नहीं; यह कहते हैं /
हे श्रीरामचन्द्रजी, हम वेदान्तियों के मत में तो यह जगत् नामका स्वप्न संविदाकाशमय ही है,
इसमें इष्ट और अनिष्ट की दृष्टियाँ (यह इष्ट है, यह अनिष्ट है इस प्रकार की प्रतीतियाँ) तथा
तन्मूलक राग और द्वेष किस आकार के होंगे, यह कहिये