Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 101, Verse 6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 101, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 101 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
संविन्नरोऽमरो नागः संवित्स्थावरजंगमम् ।
भावाभावादयोऽस्याब्धेस्तरङ्गावर्तवृत्तयः ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
ससार के स्री पदार्थ एकमात्र अविनाशी स्रंविदृरुप ही हैं; इसलिए उनके जन्म, मरण आदि
की भी संभावना नहीं हो सकती, यह कहते हैं /
हे श्रीरामचन्द्रजी, नर, अमर (देव), नाग, स्थावर, तथा जंगम-ये सबके सब संविद्रूप ही
हैं। भाव, अभाव (77) आदि भी इसी संविद्रूप सागर की तरंग, भ्रमि आदि वृत्तियाँ हैं