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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, Verse 27

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 102, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 27

संस्कृत श्लोक

भावं निगूहयन्त्येते तमुत्तममनुत्तमाः । ग्राम्यैर्धनैः किलानर्घ्य कश्चिन्तामणिरापणे ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

दाभ्मिक लोग सर्वत्र अपने में तत्वज्ञ के लक्षणों का प्रचार करते फिरते हैं; परन्तु जो सचमुच तत्त्वज्ञानी है. वे लोग अपने स्वरूप को छिपाये फिरते हैं; उन्हें इसकी चाह नहीं होती कि हमें सव लोग ज्ञानी समझें / हे श्रीरमजी, इसी विशेषता से वे फटिवाने जा सकते हैं; इस आशय से कहते हैं हे श्रीरामचन्द्रजी, वे सर्वोत्तम ज्ञानी महानुभाव अपने उस उत्तम भावको छिपाये-फिरते हैं, क्योकि गाँवों तथा नगर आदि के धनों से जो खरीदी नहीं जा सकती, ऐसी चिन्तामणि को भला बाजार में बेचने के लिए कौन फैलायेगा ?