Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 103, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 103, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 103 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
शरीरनाशे नाशश्चेच्चिन्मात्रस्य तदुच्यताम् ।
हर्षस्थाने विषादः किं मरणे संसृतिक्षये ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
चुख-दुः:खरूप ज्ञान के सिवा चैतन्य कुछ नहीं है / विशेष ज्ञान में अवच्छेदकता सम्बन्ध से
शरीर कारण है / शरीर का नाश होने से ज्ञान का नाश माननेवाले चावाकि और वैशेषिकों की शंका
उभाड़कर उसका निराकरण करते हैं /
शरीर के नाश से ही यदि चिन्मात्र का नाश हो गया, तो मरण से ही संसार का नाश हो जाय,
फिर हर्ष की जगह विषाद क्यों ?