Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 104, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 21
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हिन्दी अर्थ
उत पर भी बहुत से ग्रहपाठियों के साथ मिलकर अभ्यास करना आपस में एक दूसरे के
अनुभव के आदान-प्रदान द्वारा बहुत जल्द ज्ञानप्रतिष्ठा का हेतु हैं, ऐसा कहते हैं ।
यह आत्मज्ञान तरह-तरह की असंभावना, विपरीत भावना आदि रखनेवाले आप लोगों के
मिलजुल कर अभ्यास न करने से, ज्ञात होता हुआ भी, अज्ञातप्राय हो जाता है