Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, Verse 39
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 104, verse 39 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 39
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हिन्दी अर्थ
अपने असली स्वरूप का
ज्ञान कराने के लिए इस ग्रन्थ को छोड़कर दूसरा ग्रन्थ नहीं है, इसलिये जैसे तैलार्थी (तेल
चाहनेवाले) तिलों का संग्रह करते हैं वैसे ही अपना कल्याण चाहनेवालों को यह इच्छित अर्थ
देनेवाला है इस बुद्धि से इस ग्रन्थ का संग्रह करना चाहिये