Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, Verse 81
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 104, verse 81 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 81
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हिन्दी अर्थ
यह जगत् न तो उत्पन्न होता है, न उत्पन्न होकर विनष्ट
होता है ओर न कभी भविष्य में होनेवाला ही है । यह चिदाकाश से वैसे ही अभिन्न है जैसे
कि आकाश से शून्यता अभिन्न है