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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, Verse 91

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 104, verse 91 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 91

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

स्वप्ननगर आदि के समान ही निराकार होती हुई भी साकार-सी संवित्‌ जगत्‌ रूप से स्थित है । जैसे मेरु पर्वत के धूलि-कण परमाणु के समान अणु हैं वैसे ही संविदाकाश आकाश से भी अणु (सूक्ष्म) है