Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, Verse 93
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 104, verse 93 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 93
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हिन्दी अर्थ
यदि करई शंका करे कि इट आदि से नगर आदि की उत्पत्ति दिखलाई देती है अतः जयत् से
ही जयत् की उत्पत्ति हो, न कि ब्रह्य से / इस पर कहते हैं /
जो नगर आदि सृष्टि के आरम्भ में उत्पन्न नहीं हुआ वह जगत् से कैसे उत्पन्न हुआ ? दूसरी
बात यह भी है कि स्वप्न में ईंट आदि के बिना ही नगर आदि दिखाई देते हैं । जाग्रतवेदनाकाश में
जो नगर है, वही हमारे सिद्धान्त में स्वप्न में भी नगर है और वहाँ पर व्यभिचार स्पष्ट है, क्योंकि
वहाँ ईट आदि से नगर निर्माण नहीं होता है