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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 105, Verse 3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 105, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 105 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

स्वप्न एवात्र दृष्टान्तः पुरमण्डलमण्डितः । स्वप्ने जगन्न किंचित्सदित्थमाभाति भासुरम् ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कोई कहे कि अनुभव से ही कूटस्थ आकाश से चलनात्मक कायु की उत्पत्ति, रूपरहित वायु से रूपवान्‌ तेज की उत्पत्ति, नीरस तेज से रसरुप जल की उत्पत्ति तथा गन्धहीन जल से गन्धवती पथिकी की उत्पत्ति की कल्पना करेंगे / अनुभवरूप भगवती सवित्‌ ही हम लोगों के सारे विरोध को हटाकर अनुभवानुरूप सब पदार्थों का समर्थन कर देगी / इस पर कहते हैं । यदि दूर की उड़ान भर कर अन्त में फिर लाचार होकर संवित्‌ की ही शरण लेनी पड़ती है, तो पहले ही जैसे वह स्वप्न आदि में स्वप्न जगत्‌ का वेष धारण करती है वैसे केवल विवर्त से सारे जगत्‌ का वेष धारण करती है, इस सर्वार्थसाधक निर्मल सिद्धान्त को मान लेने में कौन दोष है ?