Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 106, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 106, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 106 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां जगत्सत्तालयोदयौ ।
स्वानुभूत्यात्मकं स्वान्तः स्थितं तद्विद्धिचिन्नभः ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे दो (कल का और आज का) सूर्य एक-से होते हैं जैसे दो
युग्मज यानी जुडवे पुरुष एक-से होते हैं वैसे ही ये जाग्रत और स्वप्न भी एक-से हैं । इनमें तनिक
भी विलक्षणता नहीं है