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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 106, Verse 2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 106, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 106 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । समयोर्यमयोर्भ्रात्रोर्व्यवहाराय नामनी । यद्वत्क्रियेते द्वे तद्वज्जाग्रत्स्वप्नशिलामये ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

यह जाग्रत्‌ निरा स्वप्न है, जो कि जगत्रूप से त्यक्त न होता हुआ अज्ञानरूप ही है, मूलतः शिलारूप ही है ओर अधिष्ठान रूप से शून्य आकाश ही है