Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 107, Verse 23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 107, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 107 · श्लोक 23
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हिन्दी अर्थ
उक्त अन्यताभ्रान्ति वास्नावश होती हैं, जिसे वासना नहीं है. उसे उक्त श्रम नहीं होता, ऐसा
कहते हैं /
हे श्रीरामचन्द्रजी, इन्द्रियों से पदार्थों का अनुभव करते हुए ही आप वासनाशून्य अन्तःकरण
होकर निरतिशय आनन्दरूप चिदात्मा के ज्ञान से युक्त हो सुषुप्ति की तरह स्थित होइये