Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 107, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 107, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 107 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
काष्ठमौनमृता एव व्यवहारगता अपि ।
खगमा एव वा सर्वे भावाः स्थावरजङ्गमाः ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
दो जलो की तरह वस्तुतः इन दोनों में (जाग्रत् और स्वप्न में) भेद नहीं है, ये दोनों निर्मल
चिन्मात्र आकाशरूप एक ही हैं