Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 107, Verse 55
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 107, verse 55 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 107 · श्लोक 55
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हिन्दी अर्थ
अवयवशून्य चिन्मात्ररूप यह आकाश बिना किसी
कारण के ही चिदाकाश द्वारा चिदाकाश में जगद्रूप से अनुभूत होता है