Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 107, Verse 57
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 107, verse 57 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 107 · श्लोक 57
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हिन्दी अर्थ
तत्-तत् नामरूपस्वरूप का त्यागकर परिशिष्ट चिन्मात्र आकाश ही
है, यों जगत् को चिन्मात्र जानकर चिदेकघन को पत्थर के समान अचल होना चाहिये । इससे
अतिरिक्त मायिक देहावस्था उत्तम नहीं है