Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 107, Verse 61
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 107, verse 61 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 107 · श्लोक 61
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
पलक भर में एक स्थान से दूसरे स्थान में प्राप्ति होने पर मध्यमे जो चिति का
अशेषविशेषशून्य स्वरूप है, तन्मय ही यह विश्व है, इसमें द्वैत ओर एेक्य भ्रम कैसे हो सकता
है ?