Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 108, Verse 9
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 108, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 108 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
प्रातःप्रातर्विकसितात्सर्वाशाभासनोद्यतात् ।
यतः प्रतापजनितश्रीरुदेत्यम्बुजादिव ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
अतएव जिन्हे तनिक भी विवेक झलक प्राप्त हो गरु उन्हे अत् पथिकी आदि का लाभ
करानेवाला विचार, जो जन्म को निष्फल बनानेवाला है, छोड़कर जन्म को सफ़ल बनाने वाले
वैराग्य आदि साधनों का सहारा लेना चाहिये, इस आशय से कहते हैं /
पृथिवी आदि असत्-पदार्थ के विचार-विमर्श से जन्म वृथा जायेगा, हे आकाश को धोने का
उद्योग करनेवाले मूर्खजीव, तेरे हाथ कुछ भी न लगेगा । जैसे सुवर्ण, रत्न आदि के लोभ की इच्छा
से प्रवृत्त आदमी यदि सोने और हीरे की खान का धोना-पोंछना छोड़कर आकाश को धोने-पोंछने
लगे, तो चाहे कितनी ही मेहनत क्यों न करे फल कुछ न देखेगा वैसे ही पृथिवी आदि असत् पदार्थों
का विमर्श भी आकाश धोने के तुल्य वृथा ही है, यह भाव है