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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 109, Verse 10

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 109, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 109 · श्लोक 10

संस्कृत श्लोक

राजोवाच । गम्यतां सङ्गरायाशु संविधानं विधीयताम् । स्नात्वाहं पूजयित्वाग्निं निर्गच्छामि रणाजिरम् ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

राजा विपश्चित्‌ को सदा ब्राह्मणों के हित का ख्याल रहता था, अतएव देवताओं में वहि के ब्राह्मण होने के कारण वह देवताओं में अग्नि की ही भक्ति के साथ पूजा करता था, अग्नि के सिवा ओर किसी देवता को जानता तक न था