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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 111, Verses 25–27

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 111, verses 25–27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 111 · श्लोक 25-27

संस्कृत श्लोक

मुद्गराणां च सरितः प्रासानां सरितो रयात् । चक्राणां चैव सरितः परश्वधनदीरयाः ॥ २५ ॥ तोमराणां च सरितो भिन्दिपालमहापगाः । पाषाणानां च सरितो वाताः कल्पान्तशंसिनः ॥ २६ ॥ अशनीनां च सरितो विद्युतां सरितस्तथा । जलधारासरित्पूराः खङ्गवर्षसमन्विताः ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

उक्त संग्राम गजरूपी शूरवीर सामन्तो के मदजल का शोषण कर रहा था, वहाँ दूसरों को मारने मेँ अत्यन्त रसिक वीरयोद्धा काल के आनन्द की पुष्टि कर रहे थे, अपने मुँह से अपनी वीरता का बखान न करने से छिपे हुए शूरवीर योद्धाओं का काम ही रण में उनकी वीरता देखनेवाले लोगों को मुँह से उनके शौर्य की घोषणा करा रहा था, छिपे हुए कायरों का भी काम ही दर्शकों द्वारा प्रभु के समीप उनकी अशूरता की घोषणा करा रहा था, उक्त संग्राम सोये हुए अपने शौर्य आदि गुणों का उद्बोधन करता था, भुजबलशाली अतएव राष्ट्र मे दुर्बल लोगों के आधारभूत शूरवीरों का धन था