Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 111, Verses 31–32
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 111, verses 31–32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 111 · श्लोक 31,32
संस्कृत श्लोक
चतुरङ्गश्चतुर्दिक्कं बलौघः स पराङ्मुखः ।
ययौ प्रावृङ्गिरिणदीमहावाह इव द्रुतः ॥ ३१ ॥
वहत्स्विन्नबृहच्छिन्नपताकाकेतुपादपः ।
मरीचिपुष्पशबलविलोलासिलतावनः ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
अभिमानरूपी उन्माद वायु के कारण
उन्मत्त हुए योद्धाओं द्वारा प्रणत (शरणागत) लोगों पर भी प्रहार किये जा रहे थे । वह संग्रामस्थल
प्राणां द्वारा प्राप्त करने योग्य धनों का नूतन बाजाररूप नगर था । वस्त्रों से बंधी हुई पताकाओं के
समूह ही लहरा रहे हस्तवृक्ष बन गये थे । खून से अत्यन्त लाल होने के कारण वह रणांगण
त्रैलोक्यलक्ष्मी का भूषणभूत मूँगा बन गया था