Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 112, Verses 16–18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 112, verses 16–18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 112 · श्लोक 16-18
संस्कृत श्लोक
गन्धमादनपुन्नागवनकुञ्जेषु पुञ्जिताः ।
विद्याधरकुमारीभिर्गान्धाराः परिरक्षिताः ॥ १६ ॥
हूणचीनकिरातानां मुक्तैस्तैश्चक्रवर्षणैः ।
कमलानीव लूनानि शिरांस्यभिमुखानिलैः ॥ १७ ॥
निलीपा नलिनीनाले कण्टका इव निश्चलाः ।
द्रुमे द्रुमे द्रुममया भयात्त्वस्यावसंश्चिरम् ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
अकाल (अनवसर मे) महाप्रलय के आविर्भाव के सदृश उसका आकार अत्यन्त घना था, खून के
महासागरों ने पृथिवी ओर अन्तरिक्ष के मध्यवर्ती अवकाश को ढक दिया था, देदीप्यमान शस्त्रास्त्रों
के खण्डो की राशिरूपी उछल रहे रत्नों से उसका मध्यभाग पटा था, चल रही सेनाओं में चल रहे
क्षेपणी यन्तर के (गुलेल के) पत्थर व्यस्त थे । रक्त के छोटे छोटे कण और कुहरेरूपी सन्ध्या काल
के मेघ से युक्त थी, कहीं पर धूलिरूपी मेघ से अस्त्रश्त्ररूपी जल का सागर पी डाला गया
था