Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 112, Verses 21–22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 112, verses 21–22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 112 · श्लोक 21,22
संस्कृत श्लोक
पारसीकाः परं पूरैः पारं प्राप्य पयोनिधेः ।
निपेतुः पवनैः पूताः प्रलये तारका इव ॥ २१ ॥
ववुरम्भोधिकुट्टाका दृषदां कटकाङ्किताः ।
सर्वदिग्वनलुण्टाका वाताः प्रलयशङ्किताः ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
राजा ने अपने देश के सैनिकों के हित के लिए शत्रुवध के लिए अग्निदेव को नमस्कार करके जप कर
शीघ्र जैसे उस भीषण अरत्र को छोड़ा, वैसे ही उसकी सहायता के लिए महान् अस्त्र श्रेष्ठ पर्जन्यास्त्र
को शत्रुरूपी आतप की शान्ति के लिए छोड़ा