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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 112, Verses 8–10

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 112, verses 8–10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 112 · श्लोक 8-10

संस्कृत श्लोक

पश्चिमार्णवतीरस्था नालिकेरधरावनौ । यवना विगतप्राणा निगीर्णा मकरोत्करैः ॥ ८ ॥ नाराचनिकरं नीलं निमेषं नासहञ्छकाः । रमठा नलिनीषण्डा इव ताण्डवितासवः ॥ ९ ॥ श्रवणाभोगशृङ्गाग्रो महेन्द्रोऽद्रिर्दिवि व्रजैः । विद्रुतैर्वलितो नीलैर्जालैर्जलमुचामिव ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

चतुरंगिणी महती सेना से चारों ओर धिरे हुए राजा ने अटारियों से परिवृत नगर से कठिनाई के साथ निकलकर संग्राम संलग्न अपनी सेना को खाली (बलहीन) देखा और शत्रुसेना को बलयुक्त देखा। शत्रु सेना का क्या कहना था, वह युद्ध के लिए संलग्न गरज रहा भयंकर चलनेवाला समुद्र ही थी, बाणरूपी जलकणों से खूब भरी थी, मकराकार सेना के व्यूहो से पूर्ण थी, हाथियों के झुण्डों से घिरी थी, (५) अश्वो की कतारों से विस्तारयुक्त थी