Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 115, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 115, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 115 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
अमी दूरालोकव्यवहितमहावर्त्मनिचयाः पुरःप्राकाराणां कुलशिखरिणो बिभ्रति वपुः ।
विशन्तीरम्भोधिं कलय लुलिता भान्ति सरितः पटस्यान्तः सक्ताः प्रतनुसितसूत्रा इव दशाः ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
देव, मौलसिरी, केसर, नारियल के वृक्षों से भरी हुई
इन वनस्थलियों पर भी कृपया दृष्टिपात कीजिये जो विविध सुगन्धियों से पूर्ण वायुओं को बहा
रही हैं