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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 115, Verse 31

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 115, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 115 · श्लोक 31

संस्कृत श्लोक

क्वचिद्हुंकारकांकारैरङ्गारनिकरान्करैः । किंकरैर्विकिरत्यर्को मूर्खसंसर्गवानिव ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

कुन्द ओर मन्दार (पारिजात) की पुष्पराशियों की सुमधुर सुगन्धि के भार से मन्दगति वाले अतएव तुषारकणों से संयुक्त जैसे वायुओं का इस गन्धमादन पर्वत पर स्पर्श कीजिये