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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 116, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

अनुचरा ऊचुः । देव पश्यात्र संग्रामलग्नसीमान्तभूभृताम् । कचन्ति हेतिसंघाता विसरन्ति बलानि च ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

पार््वचरों ने कहा : हे उदाराशय, जिनकी ललनाएँ विहारक्रीडाओं में सदा आसक्त रहती हैं, ऐसे किन्नरगण उत्कट संचारिभावों ओर संभोगसिगार से दिवस चेष्टाओं को भूलकर इस पर्वतपर लतानिकुंजों में अस्फुट मधुर तानवाले गीत गाते हैं ओर सुनते हे

सर्ग सन्दर्भ

एक सौ चौदहवाँ सर्ग समाप्त एक सौ पन्द्रहवों सर्ग चारों दिशाओं में वन, पर्वत, वृक्ष, नदी, समुद्र, वायु, पशु-पक्षी, मेघ आदि का वर्णन।