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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, Verse 31

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 116, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 31

संस्कृत श्लोक

गायत्यद्रिशिरस्तरौ दलपुटे निःश्वस्य विद्याधरी काकल्याऽतिलकं वियोगविधुरा बाष्पाकुलैषा पुरः । नाथोत्सङ्गगृहे गृहीतचिबुकं स्मेरं भवच्चुम्बनं स्मृत्वास्वाद्य रसायनं हतसमा नीता मयैता इति ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

कहींपर सूर्य मूर्खो की कुसंगति में पड़ पुरुष की नाई सेवकों की भाँति आज्ञाकारी सूर्यकान्तमणियाों से गुफा आदि मेँ जलाये जा रहे प्राणियों के हुंकार और चीत्कार पूर्ण रोदनं से युक्त अंगारों को अपनी किरणों से (हाथों से) फेंक रहा है