Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, Verse 33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 116, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
पश्यैष सोऽस्मदवलोकनशान्तशापो विद्याधरो विटपितामवमुच्य बालाम् ।
कण्ठेकरोति विटपाकृतिविप्रलम्भैस्तैरेव बाहुभिरलं स्फुटपुष्पहासः ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
कमलो की सुगन्धि से परिपूर्ण, शीतल जलकणों से लदे हुए, चन्द्रकिरणों के समूह की तरह
स्वच्छ लहरिर्यो को छिन्न -भिन्न करनेवाले सामने बह रहे ये वनभूमि के स्वच्छ शत्रु विरहिणी नारियों
के लिए अग्निपूर्ण के तुल्य संतापकारी होते हैं