Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, Verse 36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 116, verse 36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
भात्यत्र पश्य रविणा कटके सुवेलशैलस्य काञ्चनशिला सकलामलश्रीः ।
वेलावलोलवरुणालयवीचिभङ्गपर्यस्तवाडवकृशानुकणोपमाना ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
यह महिला विलक्षण सुरतानन्द को देनेवाले मदसंभोग से युक्त रात्रि के बीतने
के भय से दुःखी होकर सामने दिखाई दे रही साँपों से वेष्टित चन्दनलता की तरह द्रवित हुए अपने
पति को जरा भी नहीं छोडती है ॥ ३ ५॥ नौबतखाने में बजी हुई प्रातःकाल की शहनाई से कोलाहलयुक्त
दिवसों द्वारा डाँटी-डपटी गई अतएव विदीर्ण हृदय-सी नारी अपने पति के वक्षःस्थल में विलीन हो
गई है